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मणिप्रवाल

मणिप्रवाल वह काव्य रीति है जो 13 वीं शती में गीत के समानांतर विकसित हुई । यह वह काव्य पद्धति है जिसमें संस्कृत और मलयालम की पृथकता और भेदकता प्रकट न होकर दोनों का समन्वित रूप स्पष्ट होता है । 14 वीं शती में संस्कृत में निर्मित 'लीलातिलकम्' नामक ग्रंथ में मणिप्रवाल और गीत के लक्षण परिभाषित किए गए  हैं । मणिप्रवाल साहित्य वास्तव में केरल में आए ब्राह्मण तथा तद् युगीन केरल के उच्च वर्ग के बीच हुए सांस्कृतिक आदान-प्रदान के फलस्वरूप उत्पन्न हुआ था । कूत्तु, कूडियाट्टम आदि कलारूपों ने मणिप्रवाल के विकास में सहायता पहुँचाई । कूडियाट्टम में जो विदूषक है वह मणिप्रवाल में श्लोक प्रस्तुत करता है । चम्पू, सन्देशकाव्य आदि काव्य रूप मणिप्रवाल साहित्य में निर्मित हुए । सुन्दर वारांगनाओं का वर्णन करने वाली श्रृंगारपरक कृतियाँ ही मणिप्रवाल में लिखी गईं । देवस्तुति, राजस्तुति, देश-वर्णन आदि विषय पर भी रचनाएँ की गईं । मणिप्रवाल साहित्य की प्रमुख रचनाएँ हैं - 'वैशिकतंत्रम्', 'उण्णियच्ची चरितं', 'उण्णिचिरुतेवी चरितं', 'उण्णियाडि चरितं', 'उण्णुनीलि सन्देशम्', 'कोकसन्देशम्', 'अनंतपुरवर्णनं', 'चन्द्रोत्सवं', 'रामायणम चंपू', 'नैषधं चंपू', 'भारतं चंपू' आदि । 15 - 16 वीं शताब्दियों को चम्पू काव्य का सुवर्णकाल बताया जाता है ।



 

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