कालांतर में वैज्ञानिक ग्रन्थों का संशोधन आवश्यक हो जाता है । परवर्तीकाल में अनेक वैद्य हुए जिन्होंने प्राचीन ग्रंन्थों का संशोधन - परिवर्तन किया । किन्तु वाग्भट ने पूर्ववर्ती आचार्यों का पथ छोड़कर उनके ग्रंथों का अध्ययन कर सामाजिक आवश्यकता के अनुरूप उनके आशयों का परिष्कार कर उनका समाहार किया । केरल की
आयुर्वेद - परंपरा का आधार वाग्भट के ग्रन्थ हैं । दक्षिण भारत में विशेषतः केरल में ही वाग्भट को अधिक प्रचार मिला । उत्तर भारत में चरक और सुश्रृत का ही आज भी प्राधान्य है ।
वाग्भट ने पूर्ववर्ती आश्यों का संग्रह कर सब, को सहायता देने के लिए 'अष्टांगसंग्रह' रचा । स्वयं वाग्भट ने कहा है कि आयुर्वेद रूपी क्षीरसागर का मथन करके 'अष्टांगसंग्रह' रूपी अमृत प्राप्त किया है ।
'अष्टांगह्रदय' वाग्भट की दूसरी कृति है जिसमें वाग्भट ने विविध विषयों से सम्मिलित आयुर्वेद विज्ञान के सारांश का अधिक विस्तार या संक्षेप न करके सारतत्व को प्रस्तुत किया । वाग्भट ने अनेक बातों में चरक का अनुसरण किया है । विश्वास किया जाता है कि वाग्भट बौद्धधर्मावलम्बी थे । विद्वानों का मत है कि वाग्भट का जीवन काल ईस्वी सन् चौथी शताब्दी से पूर्व है ।
'अष्टांगह्रदय' का लेखक वाग्भट सिंधुदेश में रहे । वाग्भट के पुत्र सिंहगुप्त के पुत्र माने जाते हैं । वाग्भट के दो गुरु थे एक अपने पिताजी और दो अवलोकितेश्वर नामक व्यक्ति । वाग्भट जो बौद्ध धर्मावलम्बी थे, देश से पलायन कर गुजरात तथा कर्नाटक से होकर केरल में पहुँचे थे । केरल के 'अष्टवैद्य' वाग्भट की परम्परा से अपने को जोड़ते हैं । 'अष्टांगह्रदय' में कायचिकित्सा को ही प्राधान्य दिया गया है ।
कायचिकित्सा
आयुर्वेद के अष्टांगों में प्रथम ही कायचिकित्सा है । यह सामान्य रोगों के लिए की जाने वाली चिकित्सा पद्धति है । इसमें रोगमुक्ति औषध प्रयोग से हो जाती है । कभी ऐसा रोग भी है जिस के लिए कायचिकित्सा की जाने पर फिर शल्य चिकित्सा की आवश्यकता होगी । आयुर्वेद ने चिकित्सा पद्धति को दो विभागों में बाँटा है - 'शोधन' और 'शमन' । औषध चिकित्सा से जब रोगमुक्ति नहीं होती तब रोग को बाहर निकाल देना ही 'शोधन चिकित्सा' है । औषधी से रोग मुक्त हो जाता है तो उसे 'शमन चिकित्सा' कहा जाता है । 'शोधन चिकित्सा' के पाँच भेद हैं - वमन, विरेचन, वस्ति, रक्तमोक्ष और नस्य । यही 'पंचकर्म', कहलाता है । 'शमन चिकित्सा' के छह भेद हैं - दीपन, पायन, क्षुत्त, तृष्णा, व्यायाम और मारुत ।
औषधियाँ दो प्रकार की होती हैं - 'ऊर्जस्कर' और 'रोगघ्न' । 'ऊर्जस्कर' वे औषधियाँ हैं जो यौवन को बनाये रखते हुए वार्धक्य को दूर करने वाली रसायन चिकित्सा में प्रयुक्त होती हैं ।
तथा यौन - क्षमता बढाने वाली 'वाजीकरण' चिकित्सा में भी उसका उपयोग किया जाता है । रोगमुक्ति करने वाली औषधियाँ 'रोगघ्न' विभाग में आती हैं ।