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साहित्य

मलयालम का साहित्य आठ शताब्दियों से अधिक पुराना है । किन्तु अब तक ऐसा कोई ग्रंथ प्राप्त नहीं हुआ है जो उसकी प्रारंभिक दशा पर प्रकाश डालता हो । अतः साहित्य के उद्गम का कोई स्पष्ट विचार उपलब्ध नहीं है । यह अनुमान लगाया जा सकता है कि उस काल में लोकगीत जैसा लोक साहित्य प्रचलित रहा होगा । अब तक कोई कृति उपलब्ध नहीं हुई है जिसकी रचना ईस्वीं सन् 1000 से पहले की गई हो । दसवीं शती के उपरान्त लिखित कईं ग्रंथों की प्रामाणिकता को लेकर भी विद्वान एकमत नहीं हैं । यद्यपि केरलीय साहित्य से सामान्यतः मलयालम साहित्य का ही अर्थ लिया जाता है तथापि तमिल व संस्कृत साहित्यों को केरल के विद्वानों का योगदान भी महत्वपूर्ण रहा है । बाद में केरल के विद्वानों ने अंग्रेज़ी, कन्नड, तुळु, कोंकणी, हिन्दी आदि भाषाओं में भी रचनाएँ की हैं ।

19 वीं शताब्दी के अतिंम चरण तक मलयालम साहित्य का जो इतिहास मिलता है वह काव्य का ही इतिहास है । साहित्य की प्रारंभिक दशा का परिचय देने वाला काव्य ग्रंथ 'रामचरितम' है जिसे 13 वीं शताब्दी में लिखित बताया जाता है । यद्यपि मलयालम के प्रारंभिक काव्य के रूप में 'रामचरितम' को ही लिया जाता है तो भी केरल की साहित्यिक परंपरा उससे भी पुरानी है । प्राचीन काल में केरल को 'तमिष़कम्' का भाग ही समझा जाता था । दक्षिण भारत में सर्वप्रथम साहित्य का स्रोत भी तमिष़कम की भाषा में फूट पडा था । तमिल का आदिकालीन साहित्य 'संघम कृतियाँ' नाम से जाना जाता हैं । संघम काल नाम ही उन कृतियों को तथा उनके रचनाकाल को घोषित करता है । संघमकालीन महान रचनाओं का सम्बन्ध केरल के प्राचीन चेर-साम्राज्य से रहा है । 'पतिट्टिप्पत्तु' नामक जो संघमकालीन कृति है उसमें दस चेर राजाओं का प्रशस्तिगीत है । 'चिलप्पतिकारं' महाकाव्य के प्रणेता इलंगो अडिगल चेर देश में पैदा हुए थे । इसके अतिरिक्त तीन खण्डों वाले प्रस्तुत महाकाव्य का एक खण्ड 'वञ्चिक्काण्डम' का प्रतिपाद्य विषय चेरनाड में घटित घटनाएँ हैं । संघमकालीन साहित्यिकों में अनेक केरलीय भी हैं ।
 


 

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