श्री नारायण गुरु किसी एक धर्म, समुदाय या देश के गुरु नहीं थे। उनका नज़रिया पूरी दुनिया के लिए था। उनके कई शिष्य थे। उनमें सन्यासी शिष्य और गृहस्थ शिष्य शामिल थे। शिष्यों ने गुरु के विचारों को गहराई से अपनाया। साथ ही, गुरु ने उनकी अलग-अलग काबिलियत को प्रेरित किया और मज़बूत किया। उनके कई शिष्यों ने बाद में अलग-अलग फील्ड में अपनी पहचान बनाई। उन्होंने गुरु के विचारों और आदर्शों को ज़िंदगी में अपनाया।
अपने सन्यासी शिष्यों को चुनने में भी गुरु का नज़रिया अलग था। उनके खास त्यागी शिष्यों में शिवलिंगदास स्वामी, भैरव शांति, बोधानंद स्वामी, सत्यव्रत स्वामी, श्री नारायण चैतन्य स्वामी, संथालिंग स्वामी, नटराज गुरु, धर्मतीर्थर, नारायणतीर्थ स्वामी और अर्नेस्ट किर्क शामिल थे।
केरल रेनेसां का इतिहास सिर्फ़ हिंदू धर्म में सुधारों तक ही सीमित नहीं है। यह पिछड़े समुदायों के अधिकारों के लिए संघर्ष से भी आगे जाता है। श्री नारायण गुरु, अय्यंकाली और वैकुंडा स्वामी सभी समाज के निचले तबके से आए थे। उन्होंने सीधे ब्राह्मणवादी दबदबे को चुनौती दी। अपनी कोशिशों से, वे इंसानी इज़्ज़त को काफ़ी हद तक वापस लाने और ऊपर उठाने में कामयाब रहे।
श्री नारायण गुरु के नैतिक नेतृत्व ने सामाजिक सुधार आंदोलन को मज़बूती दी। इसने सुधारकों और विचारकों को उनके शुरू किए गए संघर्ष को जारी रखने के लिए प्रेरित किया। कोच्चि, मालाबार और त्रावणकोर के शिष्य आगे आए। उन्होंने गुरु के विचारों से प्रेरित होकर यह ज़िम्मेदारी ली। उनमें डॉ. पल्पु, टी. के. माधवन, सहोदरन अय्यप्पन, कुमारन आशान, मूलूर पद्मनाभ पणिक्कर, सी. कृष्णन और मूरक्कोत्त कुमारन जैसे नामी लोग थे।